Computer Memory Kya he or Memory ke Prakar

स्मृति (Memory)- किसी भी निर्देश, सूचना अथवा परिणाम को संचित करके रखना ही स्मृति कहलाता है। हमारे मस्तिष्क का भी एक भाग स्मृति के लिये प्रयोग होता है। यदि हमें कोई गणना करनी है तो जिन संख्याओं की गणना की जानी है उनको पहले स्मृति में रखते हैं, फिर गणना के उपरान्त परिणामों को स्मृति में रखने के बाद ही उत्तर देते हैं। अतःस्पष्ट है कि स्मृति हमारे मस्तिष्क में दिये जाने वाले सन्देशों, सूचनाओं, निर्देशों आदि को संचित करके रखने वाला एक भाग है। कम्प्यूटर द्वारा वे सभी कार्य कराये जा सकते हैं, जिनको हम अपने मस्तिष्क से करते हैं। । स्मृति में प्रोग्राम को संचित करने की विधि- कम्प्यूटर की स्मृति में प्रोग्राम को संचित करने की निम्नलिखित दो विधियाँ हैं।

(i) SAM (Sequential Access Memory)

(ii) RAM (Random Access Memory)

Computer Memory ke Prakar

(i) SAM (Sequential Access Memory)-

Sequential Access Memory

SAM का अर्थ है- क्रमिक अभिगम स्मृति अर्थात् क्रमवार लिखना या पढ़ना। जिस प्रका हम कैसिट पर गाना रिकॉर्ड करते हैं और यदि किसी कैसिट पर सन्देश गाने को सुनना चाहते हैं, तो पहले आरम्भ के 4 गानों को फॉरवर्ड करना होगा। इसी प्रकार जब कम्प्यूटर का डाटा मैग्नेटिक टेप पर स्टोर किया जाता है, तो वह भी ठीक इसी प्रकार लिखा या पढ़ा जाता है। स्टोर करने की इस पद्धति को SAM कहा जाता है।

(2) RAM (Random Access Memory)-

Random Access Memory

RAM का अर्थ है– अक्रमिक अभिगम स्मृति अर्थात् बिना किसी निश्चित क्रम में लिखना व पढ़ना। जिस प्रकार गाने को ग्रामोफोन के रिकार्ड पर सुनने के लिये किसी क्रम की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यदि उस पर स्टोर 5वाँ गाना सुनना है तो ग्रामोफोन की सुई डायरेक्ट उस गाने पर रख देते हैं और वह बजने लगता है, ठीक उसी प्रकार फ्लॉपी पर कम्प्यूटर प्रोग्राम को लिखना और पढ़ना होता है। कम्प्यूटर की आन्तरिक स्मृति जिस IC परं संचित की जाती है वह हमेशा आक्रमिक अभिगम पद्धति से ही लिखी अथवा पढ़ी जाती है। अतः RAM एवं ROM दोनों ही IC वस्तुतः RAM ही होती है।

विशेषतायें

(1) रैम प्रोग्राम के क्रियान्वयन हेतु आवश्यक निर्देशों को संग्रहित करती है।

(2) Main memory हमेशा सीधे तौर पर CPU द्वारा ही access की जाती है।

(3) Mainmemory का access time काफी कम होता है। लगभग 50 nanosecond

(4) इसे read-write memory भी कहा जाता है।

(5) यह volatile memory है। RAM पुनः दो प्रकार की होती है।

(i) Static RAM-

इसमें सूचना के storage हेतु Flip-Flop परिपथ का प्रयोग किया जाता है जो पॉवर सप्लाई के चालू होने पर data को रख सकते हैं। इस परिपथ की दो अवस्थायें Set एवं Reset क्रमशः 1 एवं 0 को प्रदर्शित करती है। _ Static RAM में रिफ्रेशिंग की आवश्यकता नहीं होती है। Static RAM तेज एवं महँगी होती है। इनका प्रयोग cache memory बनाने में होता है।

(ii) Dynamic RAM-

इसमें सूचना के संग्रहण हेतु केपिसिटर (Capacitors) का प्रयोग होता है। Capacitor का आवेशित होना 1 एवं अनावेशित होना 0 को प्रदर्शित करता है। इन capacitor पर आवेश के समय Leakage होने के कारण इन्हें निश्चित अवधि में बाह्य परिपथ द्वारा रिफ्रेश किया जाता है। कम्प्यूटर की स्मृति के भाग- कम्प्यूटर की स्मृति को दो भागों में बाँटा जा सकता है।

(i) आन्तरिक स्मृति (ii) बाह्य स्मृति।

(i) आन्तरिक स्मृति– स्मृति के बारे में इससे पूर्व प्रश्न में जो वर्णन किया गया है। वह आन्तरिक स्मृति के बारे में ही था। कम्प्यूटर की आन्तरिक स्मृति, जो IC पर स्टोर की जाती है सेमी कंडक्टर मेमोरी कहलाती है।

कम्प्यूटर की आन्तरिक स्मृति का विभाजन दो भागों में किया जा सकता है।

(A) रीड ओनली मेमोरी (B) रीड/राइट मेमोरी।

(a) रीड ओनली मेमोरी (ROM)-

ROM उसे कहते हैं, जिसमें लिखे हुये प्रोग्राम के आउटपुट को हम केवल पढ़ सकते हैं, परन्तु उसमें अपना प्रोग्राम संचित नहीं कर सकती ROM में अक्सर कम्प्यूटर निर्माताओं द्वारा प्रोग्राम संचित करके कम्प्यूटर में स्थायी काल जाते हैं, जो समयानुसार कार्य करते रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर ऑपरेटर को निर्देश देते रहते हैं।

बेसिक इनपुट-आउटपुट सिस्टम (Basic input-output system)- नाम का एक प्रोग्राम ROM का उदाहरण है, जो कम्प्यूटर के ऑन होने पर उसकी सभी इनपुट आउटपुट डिवाइसेज को चैक करने एवं नियन्त्रित करने का काम करता है। आरम्भ में ROM के लिये यह बाध्यता थी कि कम्प्यूटर-निर्माता भी एक बार किसी प्रोग्राम को इस IC पर स्टोर करने के बाद उसे न तो मिटा सकते थे और न ही उस प्रोग्राम को संशोधित कर सकते थे, परन्तु बाद में PROM, EPROM, EEPROM नाम की मेमोरी रखने वाली IC बनायी गयीं, जिनके निम्न लाभ हैं।

(1) प्रोग्रामेबिल रोम (PROM)– इस स्मृति में किसी प्रोग्राम को केवल एक बार संचित किया जा सकता है, परन्तु न तो उसे मिटाया जा सकता है और न ही उसे संशोधित किया जा सकता है।

(2) इरेजेबिल प्रॉम (EPROM)– इसमे संचित किया गया प्रोग्राम मिटाया जा सकता है। यदि कोई प्रोग्राम बहुत समय पहले संचित किया गया था, जिसे मिटाकर उसके स्थान पर हम नया प्रोग्राम संचित करना चाहते हैं, तो यह कार्य EPROM द्वारा सम्भव है

(3) इलेक्ट्रिकली-इ-प्रॉम (EEPROM)- इलेक्ट्रिकली इरेजेबिल प्रॉम पर स्टोर किये गये प्रोग्राम को मिटाने अथवा संशोधित करने के लिये किसी अन्य उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। इलेक्ट्रीकली सिगनल, जो कि कम्प्यूटर में ही उपलब्ध रहते हैं, हमारे द्वारा कमाण्ड्स दिये जाने पर इस प्रोग्राम को संशोधित कर देते हैं।

(b) बाह्य स्मृति-

कम्प्यूटर पर अपने किये गये कार्य को संचित करने के लिये बाब मेमोरी RAM और SAM दोनों प्रकार से कार्य करती है। इनकी संग्रहण क्षमता आन्तरिक स्मृति की अपेक्षा अधिक होती है। ये अपेक्षाकृत सस्ती होती हैं, परन्तु बाह्य स्मृति की का आन्तरिक मेमोरी की अपेक्षा अत्यन्त कम होती है। बाह्य मेमोरी निम्न प्रकार की हो सकती है।

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(1) फ्लॉपी डिस्क– डिस्क का निर्माण ट्रैक/सैक्टर के समूह द्वारा होता है। सूचनायें संचित की जा सकती हैं। संचयन क्षमता ट्रैक/सैक्टर के अभिलेखन पर निर्भर करती है।

(2) सीडी-रोम– यह एक उच्च क्षमता वाला भण्डारण उपकरण है, जो लगभग 650 MB तक सूचनायें संचित कर सकता है। 

(3) हार्ड डिस्क– हार्ड डिस्क बहुत अधिक मात्रा में (20GB से 160GB तक) डाटा संचित करने की क्षमता रखती है।

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